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आखिर क्यों हो रही है बाबा साहेब पर सियासत?
14 Apr 2015 IST
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आज डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयंती है। हर वो शख्स उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर रहा है जो राष्ट्रनिर्माण में उनके योगदान को जानता है।

खुद को दलितों की सबसे बड़ी हितैषी बताने वाली बहुजन समाज पार्टी समेत भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस भी उनकी विरासत पर हक जमाने की कोशिश कर रही हैं।

भाजपा के सहयोगी संगठन डॉक्टर अंबेडकर की तस्वीर को दलित नेता के 'फ्रेम' से बाहर निकाल कर हिन्दू नेता के 'फ्रेम' में फिट कर रहे हैं।

हिन्दू समाज में व्याप्त छुआछूत से दुखी होकर हिन्दू धर्म को 'तिलांजली' देने वाले अंबेडकर को हिन्दू समाज का 'मसीहा' बनाने की कोशिश की जा रही है।

आरएसएस और बजरंग दल की ओर से कार्यकर्ताओं और लोगों को भेजे जा रहे व्हाट्सएप मैसेज, एसएमएस में बताया जा रहा है कि अंबेडकर 'हिन्दू समाज में सामाजिक समरसता के अग्रदूत' थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी के तमाम नेता सोशल मीडिया पर अंबेडकर जयंती की शुभकामनाएं दे रहे हैं। इस मौके पर बीजेपी की ओर से कई कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जा रहा है।

सवाल सिर्फ इतना है कि आखिर बीजेपी को अंबेडकर से अचानक इतना मोह क्यों हो गया है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोग कहते हैं कि ऐसा अचानक नहीं हुआ और ना ही ये पहली मर्तबा है।

वे दावा करते हैं कि संघ हमेशा से बाबा साहेब के आदर्शों पर चलता आया है। संघ सूत्रों के मुताबिक यूपी और बिहार में सोशल इंजीनियरिंग पर जोर दिया जा रहा है।

यहां यह कहना ज़रूरी है कि जब तक मायावती ने 'तिलक, तराजू, तलवार' को जूते मारने की बात कही तब तक वह अपने दम पर सरकार नहीं बना सकीं लेकिन जब उन्होंने 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' का नारा दिया तो जनता ने बसपा की सरकार बनवाई और वो भी बहुमत के साथ।

अभी तक भाजपा को 'ब्राह्मण और वैश्य' समाज की पार्टी माना जाता रहा है और 'दलित' वोट उससे दूर ही रहा है लेकिन अब उसे और उसके सहयोगी संगठनों को समझ आ गया है कि जातिवाद 'हिन्दू समाज' की अवधारणा में सबसे बड़ी बाधा है। इसीलिए अब पूरे जोर-शोर के साथ अंबेडकर की विरासत पर सियासत की जा रही है।

अंबेडकर भाजपा के लिए कितने महत्वपूर्ण हो गए हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मोदी बर्लिन में हैं लेकिन बाबा साहेब को श्रद्धांजलि देना नहीं भूले और संघ के मुखपत्र में भी इस मर्तबा अंबेडकर साहित्य को ही प्रमुखता के साथ छापा जाएगा।

संघ या भाजपा ही नहीं बल्कि कांग्रेस भी इस विरासत पर दावा कर रही है। पार्टी ने नेता सोशल मीडिया पर तो बाबासाहेब को श्रद्धासुमन अर्पित कर ही रहे हैं, सोनिया गांधी समेत तमाम दिग्गज कांग्रेसी भी संसद स्थित अंबेडकर प्रतिमा पर श्रद्धासुमन अर्पित करते नज़र आए।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक सुशील कुमार शिंदे को इस 'दलित लुभाओ कैंपेन' की बागडोर सौंपी गई है। वह बाबा साहेब के जन्मस्थान जाएंगे और वहां कार्यक्रम आयोजित कराएंगे। पार्टी सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में एक बड़ा कार्यक्रम करना चाहती थी लेकिन राहुल गांधी की अनुपस्थिति के कारण इसे टाल दिया गया।

अभी तक जवाहर, इंदिरा और राजीव को प्रतीकों के तौर पर इस्तेमाल करती आई कांग्रेस को पहला झटका तब लगा जब नरेंद्र मोदी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की विरासत को झटक लिया और उनकी नई 'राष्ट्रवादी' छवि का निर्माण किया। मोदी ने गुजरात में पटेल की प्रतिमा बनाने की घोषणा कर एक तरह से सोशल इंजिनियरिंग ही की।

अब कांग्रेस नहीं चाहती कि बीजेपी अंबेडकर को भी छीन ले। कांग्रेस का प्रमुख वोटबैंक 'ब्राह्मण और दलित' को माना जाता रहा है, कांग्रेस जानती है कि देश में एससी आबादी करीब 16 प्रतिशत है और सरकार बनाने और बिगाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यही कारण है कि कांग्रेस ने अपना पूरा ध्यान इस 'वोट बैंक' पर लगा दिया है।

बहुत साफ है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में चुनाव बहुत दूर नहीं हैं और इन राज्यों में दलित वोट क्रमश: 8.2 और 20.5 प्रतिशत हैं। बिहार में नीतीश कुमार और जीतनराम मांझी इस 'दलित वोटबैंक' पर नज़र लगाए हैं तो वहीं यूपी में मायावती कांग्रेस और बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होंगी।

यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अंबेडकर की विरासत पर दावा कर रहे हैं। अब ऐसे में वह पार्टियां भी परेशान हैं जो 'दलित' राजनीति करती आई हैं।

2012 में सत्ता से बाहर हुईं मायावती की कोशिश दोबारा सत्ता पाने की है और मोदी लहर पर सवार भाजपा भी यूपी की सत्ता पर काबिज होने की कोशिश कर रही है। भाजपा की इस कोशिश का सबसे बड़ा नुकसान बसपा को ही होगा इसलिए मायावती अपने वैट बैंक को सहेजने की कोशिश कर रही हैं।

बिहार में इसी साल चुनाव होने हैं और जेडीयू व हम (हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा) दोनों की कोशिश दलित वोटबैंक को भुनाने की है। इन दोनों के अलावा भाजपा भी बिहार में सत्ता पाने का कोई तरीका नहीं छोड़ना चाहती।

अब बात देश के दलितों की करें तो क्या आज भी वह उस स्थिति में पहुंच पाए हैं जिस स्थिति में उन्हें पहुंचाने का सपना डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने देखा था? जवाब हर गांव, हर कस्बे और हर शहर में मिल जाएगा। दलित की चिन्ता शायद ही किसी पार्टी को है लेकिन अंबेडकर की विरासत पर सियासत करने से कोई पार्टी पीछे नहीं रहना चाहती।

 

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