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गिद्धों को खिलाई जाती हैं इंसानी लाशें
02 May 2015 IST
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मुंबई. आपने अब तक सुना होगा कि फलां पक्षी, फलां जंतु विलुप्त हो चुका है या फिर विलुप्ति के कगार पर है। लेकिन दुनिया की बढ़ती आबादी के बीच इंसानों की एक कौम ऐसी है, जिसकी जनसंख्या घटती जा रही है। ऐसा कहा जा रहा है कि अगली सदी तक इस समुदाय में शायद ही कोई व्यक्ति रहेगा। जी हां, हम बात कर रहे हैं भारत के पारसी समुदाय की। भारत में पारसी समुदाय विलुप्त होने की राह पर है। पूरे भारत में गिने चुने पारसी ही बचे हैं, जो मुंबई में रहते हैं। पारसी समुदाय की सुनी-अनसुनी बातों को बताने के लिए dainikbhaskar.com आज से अपनी ख़ास सीरीज 'जियो पारसी' शुरु कर रहा है, जिसके तहत आज हम आपको मुंबई स्थित 'टावर ऑफ़ साइलेंस' के बारे में बता रहे हैं, जो एक कब्रिस्तान है। यहां समुदाय के मृत जनों को चील, गिद्ध और अन्य पशु-पक्षियों के लिए आहार स्वरूप छोड़ दिया जाता है।
शव को करते हैं आकाश के हवाले
चील और गिद्ध जैसे पक्षी पारसी समाज के लिए बहुत महत्व रखते हैं। दरअसल, पारसी पृथ्वी, जल और अग्नि को बहुत पवित्र मानते हैं, इसलिए समाज के किसी व्यक्ति के मर जाने पर उसकी देह को इन तीनों के हवाले नहीं करते। इसके बजाय मृत देह को आकाश के हवाले किया जाता है। मृत देह को एक ऊंचे बुर्ज (टावर ऑफ साइलेंस) पर रख दिया जाता है, जहां उसे गिद्ध और चील जैसे पक्षी खा जाते हैं। इस ऊंचे या शव निपटान के स्थान को “दाख्मा” कहते हैं और पूरी प्रक्रिया को “दोखमेनाशीनी” कहा जाता है।
मालाबार हिल्स पर स्थित है टावर ऑफ़ साइलेंस
मुंबई का सबसे पॉश इलाका मालाबार हिल्स में टावर ऑफ़ साइलेंस बना हुआ है। यह चारों ओर से घने जंगल से घिरा हुआ है। ऐसा कहा जाता है कि इसका निर्माण 19 वीं सदी में हुआ था। टावर ऑफ़ साइलेंस में केवल एक ही लोहे का दरवाज़ा है। टावर का ऊपरी हिस्सा खुला रहता हैं, जहां शवों को रखा जाता है।

 

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