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19वीं सदी के बाद से एक भी इंच नहीं बढ़ पाई कांगड़ा की रेलगाड़ी
16 Dec 2013 IST
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​धर्मशाला, (नरेश भाटिया)।
19वीं सदी में फिरंगियों ने बर्तानिया हकूमत के खिलाफ भारतीय सैन्य विद्रोह की लपटों को काबू में रखने के उद्देश्य से रेल यातायात की शुरुआत की, ताकि सेना की सीमित टुकडि़यां न्यूनतम अवधि में लंबी दूरी तय कर सकें और भारतीय खनिज खदानों से कच्चा माल थोक आधार पर इंग्लैंड में प्रसंस्करण के लिए बंदरगाहों तक पहुंचाया जा सके। लेकिन आर्थिक और उपनिवेशिक स्वार्थ के वावजूद भी विदेशी शासकों ने रेल विस्तार के संदर्भ में भौगोलिक या क्षेत्रीय भेदभाव नहीं किया।

गौरतलब है कि अंग्रेजों ने भारत की मैदानी/पठारी पट्टी पर विशालकाय रेल ढांचे को विकसित करने के साथ-साथ, देश के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में भी हिमाचल की शिमला-कालका सैलानी पटरी, पूर्व में दाजर्लिंग पर्वतीय लाइन, दक्षिण में नीलगिरी रेल सेवा, पश्चिम में महाराष्ट्र का मनोरम माथेहरण रेल पथ और हिमाचल की ही कांगड़ा घाटी रेल सेवा का इतनी दक्षता से निर्माण करवाया कि आज के मेट्रो/मोनो रेल युग में भी यह धरोहरें अभियांत्रिकी का एक ऐसा अजूबा हैं, जिसकी अन्य कोई भी आगामी मिसाल हमारी स्वदेशी रेल कारीगरी अभी तक पेश नहीं कर पायी है।

ठीक इसके विपरीत वर्तमान रेल तंत्र कांगड़ा घाटी रेल लाइन के विस्तार और उच्चीकरण से भी यह कहकर पल्ला झाड़ता रहता है कि ढलानदार भू-भाग पर रेल मार्ग का निर्माण ही वाणिज्यिक दृष्टि से घाटे का सौदा है। आजादी के 65 वर्ष बाद भी भारतीय रेल महकमा, कांगड़ा जैसी खूबसूरत वादी के आगोश में स्थापित इस अदभुत रेल मार्ग की लंबाई और चैड़ाई में एक इंच तक की बढौतरी नहीं कर पाया है।

सन 1925 में निर्मित इस संकरी पट्टी रेल लाइन को उहल जलविद्युत परियोजना की भारी-भरकम मशीनरी की ढुलाई हेतु इस्तेमाल किया गया, लेकिन सन 1929 में पठानकोट से जोगेंद्रनगर तक बिछाई गई इस पटटरी पर यात्री आवागमन भी आरंभ हो गया। दार्जलिंग रेल की सर्पीली बनावट, नीलगिरी मार्ग की रैक एवं पिनियन तकनीक और शिमला-कालका मार्ग की सुरंग प्रणाली की मिश्रित अभ्यात्रिंकी के बल पर स्थापित कांगड़ा घाटी रेल महज 163 किमी के सफर में ही पठानकोट से जोगेंद्रनगर तक लगभग एक किमी की ऊंचाई हासिल करती है और देश के सभी अन्य पर्वतीय रेल मार्गों में सबसे लंबी दूरी का कीर्तिमान अपने अस्तित्व में समेटे आज भी उस लाजिमी विस्तार की राह ही देख रही है, जोकि न केवल हिमाचल में वृहद औद्योगिक विकास का सूत्रधार होगा, बल्कि हिमाचल से सटी तिब्बत सीमा तक त्वरित सैन्य पहुंच से भारतीय सामरिक हितों का भी एक प्रस्थान बिंदू साबित होगा।

फिरोजपुर रेलवे मंडल के तहत संचालित कांगड़ा घाटी रेल एक सैलानी महत्व का ही आभूषण नहीं, बल्कि गरीब की सवारी के रूप में भी इतनी कामयाब है कि पठानकोट में हिमाचल पथ परिवहन निगम का एक डिपो स्थापित होने के पश्चात भी इसके मुरीद यात्रियों में कभी कमी नहीं आई, हालांकि बस और ट्रेन की यात्रा में लगभग आठ घंटे का अंतराल बरकरार है।करीब दो दशकों से गठबंधन सियासत के शिकंजे में फंसे रेल मंत्रालय ने कांगड़ा घाटी रेल को इतनी तवज्जो देना भी मुनासिब नहीं समझा कि जन भावनाओं के मात्र कागजी तुष्टिकरण हेतु किसी विस्तार सर्वेक्षण या उच्चीकरण परियोजना रपट का झुनझुना ही उसके लिए किसी रेल बजट में घोषित किया जाए, जबकि साल दर साल हिमाचल का हर मुख्यमंत्री या मंत्री रेल भवन में रश्मी चाय पीते समय इसकी मांग करता ही रहता है।

करीब 50-60 रेल बजट बीत जाने के बाद जब 21वीं सदी में हिमाचली धैर्य भी जवाब देने लगा तो जन-दबाव को भांपते हुए रेल मंत्रालय ने हालिया वर्षों में कांगड़ा घाटी की इस जीवन रेखा को विश्व धरोहर घोषित करवाने का हवाई गुब्बारा छोड़ दिया।
ताकि प्राचीन रेल मार्ग को जस का तस रखने की पुरातत्वीय बाध्यता की आड़ में इसके आगामी विस्तार और विकास पर औपचारिक रोक स्वतः ही लग जाए और मंत्रालय को बजट आवंटन से ही निजात मिले।
हालांकि जनसंख्या की दृष्टि से बाहुबली सूबों के अधिपत्य में जकड़ी भारत की केंद्रीय राजनीतिक व्यवस्था में हिमाचल के सांसदों की आवाज को अनसुना भी कर दिया जाए, तब भी भारत सरकार अपने सुरक्षा विशेषज्ञों के उस मशविरे को कैसे नजरअंदाज करेगी जो तिब्बत के लहासा शहर में चीनी रेलवे के आगमन की आहट के पश्चात दिया गया है, क्योंकि मैदानी शस्त्रागारों और सैनिक शिविरों से मनाली होते हुए लेह तक की दूरी को न्यूनतम समय में तय करना सिर्फ कांगड़ा घाटी रेल के विस्तारीकरण और उच्चीकरण द्वारा ही संभव है। अब चूंकि भारतीय रेल चुनावी लोकलुभावन युग से बाहर निकल आई हैं, इसलिए हिमाचल वासियों के लिए इस रेल बजट में उम्मीद की किरण प्रगाढ़ हुई है कि कांगड़ा घाटी रेल के संदर्भ में कोई दूरगामी और ठोस कार्ययोजना मौजूदा रेल मंत्री साहब के पिटारे से निकल कर न केवल इसका जीर्णोद्धार करेगी, बल्कि इसके फैलाव का विस्तृत खाका भी तैयार होगा, ताकि कुल्लु-लाहौल का सेब-आलू पंजाब की मंडियों में बिना किसी रुकावट के पहुंच पाए तथा लेह-लद्दाख में रेल गाड़ी की छुक-छुक से चीन के प्रवेश द्वार पर सशक्त सामरिक दस्तक दी जा सके।​

 

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