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बीफ के लिए गायों की सप्लाई रुकने से 31,000 हजार करोड़ का बोझ
04 Apr 2015 IST
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नई दिल्ली: गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बुधवार को बीएसएफ के जवानों से भारत-बांग्लादेश सीमा के पार होने वाली मवेशियों की तस्करी पर रोक लगाने और इसे इतना सख्त बनाने के लिए कहा है कि बांग्लादेश के लोग गोमांस खाना छोड़ दें। लेकिन, यदि बीएसएफ राजनाथ सिंह के निर्देश को सख्ती से लागू करता है तो भारत को हर साल 31,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च बर्दाश्त करने होंगे।

यह खर्च सरकार को विभिन्न गौशाला में पाली जा रहीं करीब 1.25 करोड़ गायों के पालन-पोषण पर आएगा जो सरकार को उस समय तक खर्च करना पड़ेगा जब तक ये गायें अपने आप नहीं मर जाती हैं। यह आंकड़ा उस ऐलोकेशन से चार गुना ज्यादा है जो सरकार एकीकृत बाल विकास स्कीम के तहत बच्चों के पोषण के लिए आवंटित करती है।

हर साल करीब 25 लाख मवेशियों को अवैध रूप से सीमा पार भारत से बांग्लादेश तस्करी की जाती है। इसको लेकर सीमा प्रहरियों पर आरोप लगते रहे हैं कि उनकी सांठ-गांठ से ही ऐसा होता है लेकिन बीएसएफ इसका इनकार करता रहा है। लेकिन, सूत्रों का कहना है कि इस व्यापार के महत्व के कारण भारत-बांग्लादेश सीमा के पार मवेशी तस्करी को रोकना लगभग असंभव है।

बांग्लादेश में मवेशी मांस का अरबों का व्यापार होता है और मवेशियों का मुख्य स्रोत भारत है। शायद मंत्री महोदय को यह बात मालूम नहीं है कि इस मांस का बड़ा हिस्सा बांग्लेदश में नहीं खाया जाता है, बल्कि खाड़ी के देशों में इसका निर्यात किया जाता है। बांग्लादेश की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार बहुत से बांग्लादेशी नियमित रूप से गोमांस सेवन की हिम्मत नहीं कर पाते हैं और वे त्योहार या समारोह आदि के मौके पर ही गोमांस सेवन करते हैं।'

बुधवार को पश्चिम बंगाल की सीमा चौकी पर बीएसएफ के जवानों को संबोधित करते हुए राजनाथ सिंह ने कहा था, 'मुझे बताया गया है कि मवेशी तस्करी के खिलाफ बीएसएफ द्वारा निगरानी सख्त होने के बाद बांग्लादेश में गोमांस की कीमत 30 फीसदी बढ़ गई है। आप अपनी निगरानी और चौकस कर दो ताकि मवेशियों की तस्करी पूरी तरह से बंद हो जाए और बांग्लादेश में गोमांस का दाम 70-80 फीसदी बढ़ जाए और बांग्लादेश के लोग गोमांस खाना बंद कर दे।

जहां तक मवेशियों को लेकर भारत और बांग्लादेश का संबंध है तो दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। बीएसएफ के एक अधिकारी ने बाताय, 'सीमा के दोनों तरफ आर्थिक दबाव है। जहां बांग्लादेश में मांस उद्योग में इसकी बहुत ही मांग है तो वहीं भारत में जो लोग मवेशी पालते हैं वे उनको अपने पास रखकर खिलाने-पिलाने का आर्थिक साहस नहीं कर पाते हैं। उसके बाद बांग्लादेश के साथ हमारे दोस्ताना संबंध हैं और उस समय तक हम तस्करों पर घातक हथियारों से हमला नहीं कर सकते हैं जब तक हम पर हमला न हो। वास्तव में बांग्लादेश सीमा पर हमारे कर्मियों के पास गैर घातक हथियार होते हैं। इस सब कारण से अवैध व्यापार फलता-फूलता है। जब तक दूध नहीं देने वाली इन गायों की खिलाने-पिलाने का कोई व्यावहारिक समाधान नहीं होता है तब तक इसे रोक पाना असंभव है।'

सरकार को कैसे 31, 000 करोड़ खर्च करने पड़ेंगे

भारत में गायों की जीवन अवधि 15 से 20 साल होती है। डेयरी उद्योग के सूत्रों का कहना है कि मरने से करीब पांच साल पहले गायें दूध देना बंद कर देती हैं। हर साल करीब 25 लाख मवेशी सीमा पर पहुंचते हैं और यदि सरकार मवेशी की तस्करी को रोकना चाहती है तो इसे इन दूध नहीं देने वाली इन 1.25 करोड़ गायों को हर साल खिलाना पड़ेगा। मोटे तौर पर एक गाय पर साल में करीब 25,000 रुपये का खर्च आता है और इस तरह से सरकार को 31,250 करोड़ रुपये हर साल खर्च करने होंगे। इसके अलावा सरकार को गौशाला बनाने हेतु भूमि अधिग्रहण और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर भी अलग से खर्च करना होगा।

 

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